पुष्पिता का नया कविता सँग्रह
पर एक टिप्पणी
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शब्द नहीं, संवेदना की दुनिया
ओम निश्चल
स्त्री-पुरुष संबंधों की जब-जब चर्चा होती है, प्रेम उसके केंद्र में होता है। सारी की सारी संबंधहीनता प्रेम के अभाव के कारण है। प्रवासी भारतीय कवयित्री पुष्पिता का कविता संसार भी एक तरफ प्रेम की प्रफुल्ल अनुभूतियों से भरा है तो दूसरी तरफ उसमें उदासियों का एक ऐसा कोना भी है जो कवयित्री के शब्दों को आंखों की कोरों की तरह सजल बनाए रखता है। तमाम अभाव दशाओं को साधने वाली पुष्पिता की कविताओं में कैरेबियन देशों की प्रकृति, स्वदेश की स्मृतियां तथा देह और मन की अनेक अंतश्छवियां भरी हैं। सूरीनाम में कई वर्ष गुजारने के बाद हालैंड में प्रवास करने वाली पुष्पता के यहां प्रेम, प्रकृति, मानव-स्वभाव और स्त्री-मन की अंतरंग अनुभूतियों को अत्यंत ऋजु और बिंदास-भाव से व्यक्त किया गया है।
शब्द बन कर रहती हैं ऋतुएं, अक्षत और ईश्वराशीष के बाद हृदय की हथेली से पुष्पिता अवस्थी ने प्रणय, प्रतीक्षा, विरह, आतुरता, समर्पण और आराधना की लौकिक अनुभूतियों को लोकेषणा के संकरे दायरे से बाहर निकाल कर जैसे एक आध्यात्मिक सिहरन में बदल दिया है। 'आंसू दुनिया के लिए आंख का पानी है लेकिन तुम्हारे लिए दुख की आग है'--कहते हुए कवयित्री ने प्रबंधन-पटु समय में प्रेम की एक सरल रेखा खींचनी चाही है। उसके यहां प्रेम के रूपक नहीं हैं, प्रणय का पिघलता ताप है, आंखों की चौखट में विश्वास की अल्पना है, अन-जी आकांक्षाओं की प्यास है, प्रेम का धन-धान्य है, स्मृति के कुठले में संजोए अन्न की तरह अतीत का वैभव है। अचरज नहीं कि कवयित्री खुद यह कहती है--'इन कविताओं की व्यंजना आकाश की तरह निस्सीम है और आकाशगंगा की तरह अछोर भी। इनके अंदर की यात्रा मन के रंगों-रचावों की यात्रा है, रस-कलश की छलकन है। सृजन के राग का आरोहण और कृत्रिमता के तिमिर का तिरोहण है।'
प्रेम के उद्दाम आदिम संगीत से होती--प्रेम का गान करने और उसका मान रखने वाले कवियों--कालिदास, जयदेव, विद्यापति और घनानंद की परंपरा की ही धात्री पुष्पिता फिर एक बार प्रणय के पारावार में संतरण करना चाहती हैं, अपनी गंगा में प्रिय की यमुना को जीते हुए कृष्ण को राधा-भाव और राधा को कृष्ण भाव में जीते हुए देखना चाहती हैं। उनकी पदावलियों में अनुरक्त और विदग्ध अनुभवों---दोनों की उमगती कसक भरी है, रचने वाले के भीतर जैसे अकेलेपन की पिघलती मोमबत्ती। शब्दों के ताप में प्रणय की तपश्चर्या है, प्रेम को पृथ्वी की पहली और अंतिम चाहत की तरह महसूस करने की उत्कंठा है। प्यार की पवित्र जाह्नवी को दिनोदिन मैला कर रहे समय के बावजूद देह की आकाशगंगा में तैर कर आंखें पार उतर जाना चाहती हैं ठहरे हुए समय से मोक्ष के लिए। इन कविताओं का सलीकेदार अपनत्व मन पर एक ऐसी छाप छोड़ता है जैसे इन अनु्भूतियों के साथ पढ़ने वाला भी सहयात्रा कर रहा हो।
पुष्पिता की प्रेम कविताओं का विन्यास अपने समकालीनों से बहुत अलग है। उनकी ही एक कविता पुनर्जन्म का सुख की पंक्तियां कहती हैं, 'सारी स्तब्ध गति के बावजूद / मैं उस तरह नहीं चल रही / जैसे दुनिया दौड़ रही है / क्योंकि मैं जानती हूं/ जहां गति बहुत होती है / वहां गहराई नहीं होती है बहुत।' यह जो अलग-सा होना, दिखना और चलना है, यह जो गति नहीं, गहराई की चिंता करना है, यही पुष्पिता की कविताओं की ताकत है। केदारनाथ सिंह की एक पंक्ति है--'इस समय सड़क पर चल रहा कोई भी व्यक्ति मेरा समकालीन नहीं है।' इस वाक्य की रोशनी में पुष्पिता की कविताएं ठीक से समझी जा सकती हैं। उन्हें गति नहीं, गहराई की परवाह है, शब्द नहीं, संवेदना की परवाह है, तभी तो उनकी लेखनी से देह-कुसुम और देह की चाक से जैसी कविताएं फूटती हैं---शिशु-जन्म की कल्पना, उत्सवता और कामना से भरी। एक भिन्न किस्म की नवता-नवीनता का आस्वाद है इन कविताओं में--अधरों ने शब्दों से बनायी है अल्पना और धड़कनों ने प्रतीक्षा की लय में गाए हैं--बिल्कुल नए गीत--एक तरल, सजल संवेदना जैसे हृदय की हथेली पर रची हुई हो।
पुष्पिता ने बनारस से कविता-यात्रा शुरू की थी। प्रणय की प्रकृत माधुरी का आस्वाद भी यहां उन्होंने चखा था। एक आतुर, आकुल और कविता-कला के लिए समर्पित मन लिए वे अपनी कल्पनाओ में प्रेम का ही घर बनाती रहीं और प्रेम की राह में रोड़े अटकाने वाली परिस्थितियों का सामना भी किया। स्त्री जीवन में प्रेम की असंभवता को उन्होंने अपने अनुभवों के तईं ही जाना बूझा और प्रेम के बदले मिलने वाले संताप, पुरुष-वर्चस्व के घटाटोप में घुट कर जीने वाली स्त्री की वेदना को गहरे तक महसूस किया। एक ठियां से दूसरी ठियां बदलती और प्रेम में बार-बार ठगी जाने वाली स्त्री-संवेदना भी उनके यहां घनीभूत है। तथापि, प्रेम-कविताओं के लिए उनके मन का एक कोना आज भी उसी तरह सजल और करुण है।
यह केवल एक कथन भर नहीं है कि प्यार से अधिक कोमल और रेशमी कुछ नहीं बचा है पृथ्वी पर जीने के लिए। और संग्रह की आखिरी कविता नदी में नाव में तो जैसे कवयित्री की रचना-प्रक्रिया का समूचा सत्व समाया हुआ है--थोड़ा-सा धैर्य, थोड़ा-सा मौन, थोड़ी-सी आस्था, थोड़ी-सी आकांक्षा, थोड़े-से स्वप्न, थोड़ी-सी ध्वनियां और इन सब ने रचे हैं कुछ अनरचे शब्द। कहना न होगा कि पुष्पिता की ये कविताएं उस भाव-संसार और उन भाव-दशाओं का ज्ञापन-उद्घाटन हैं जिनके बिना मनुष्य-चित्त के भीतरी सौंदर्य को परख पाना संभव नहीं है। जिसके भीतर प्रेम की थोड़ी-सी भी नमी बची है, उसे ये कविताएं हृदय की हथेली से थपकियां देंगी--जीवन के एक नए आलोक-आश्वस्ति की तरफ ले जाएंगी--अपना बना लेंगी।
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